एक दोस्ती ऐसी भी...जब दोस्त की बेटी को बनाया अपने घर की भाग्यलक्ष्मी

एक दोस्ती ऐसी भी...जब दोस्त की बेटी को बनाया अपने घर की भाग्यलक्ष्मी
Anjali Singh JHBNEWS टीम,सूरत 2025-11-25 14:09:23

विशेष लेख: मनीषा शुक्ला (दिल्ली)

दोस्त की बेटी को गोद लेकर सूरत के व्यापारी ने भरा पीढ़ियों का खालीपन 

एक खालीपन था, एक अधूरी कहानी थी

तड़प थी बेटी की, वर्षों से अनजानी थी

जब मित्र ने कहा- तीसरी बेटी, मुश्किल है अब

तब दिल ने पुकारा-यह तेरी नहीं, मेरी इबादत है!

इस कविता की असली कहानी है सूरत के हीरा व्यापारी, जिग्नेश आंबलिया की, जिन्होंने मित्रता और ममत्व का एक ऐसा उदाहरण पेश किया जो सीधे दिल को छूता है। यह सिर्फ एक गोद लेने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक परिवार के वर्षों पुराने अधूरेपन को भरने की दास्तान है।


गर्भपात से पड़ा गहरा सदमा 

भावनगर के पालीताणा से ताल्लुक रखने वाले जिग्नेश आंबलिया, जो सूरत में हीरे का व्यवसाय करते हैं, उनके परिवार में पीढ़ियों से कोई बेटी नहीं थी। उनके घर में बेटा, भतीजा और चचेरे भाई का बेटा सब हैं, लेकिन एक बेटी का अभाव हमेशा एक गहरा खालीपन बनकर रहा। जिग्नेश जी और उनकी पत्नी की आँखों में इस खालीपन को भरने की तीव्र इच्छा थी।

कुछ महीने पहले, जब उनके घर दूसरा बच्चा आने वाला था, तो सोनोग्राफी में पता चला कि वह लड़का है, लेकिन दुर्भाग्यवश उसमें गंभीर शारीरिक विकृति थी, जिसके कारण उन्हें भारी मन से गर्भपात करवाना पड़ा। इस दुखद घटना ने उनकी पत्नी को बुरी तरह तोड़ दिया, और बेटी का सपना शायद सपना ही रह जाएगा ऐसा डर उन्हें सताने लगा।


ईश्वर का संकेत समझा 

इन्हीं कठिन दिनों के बीच, जिग्नेश जी के एक करीबी मित्र ने उनसे मुलाकात की। मित्र ने थोड़ी घबराहट में बताया कि उनकी पत्नी तीसरी बार गर्भवती है, और अगर इस बार भी बेटी हुई (उनके पहले से दो बेटियाँ हैं), तो परिवार में मुश्किलें बढ़ जाएँगी।

जिग्नेश जी के लिए यह पल ईश्वर के संकेत जैसा था। बेटी के लिए उनके मन में जो ममत्व था, वह तुरंत जाग उठा। उन्होंने मित्र से कहा कि वह चिंता न करें और उन्हें एक दिन का समय दें।

घर पहुँचकर, उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी पत्नी से पूछा, "अगर मेरे मित्र को तीसरी बेटी होती है, तो क्या हम उसे गोद लेंगे?"

पत्नी ने एक क्षण भी न सोचते हुए तुरंत हाँ कर दी। उस पल जिग्नेश जी को लगा कि भगवान उनकी बेटी की चाहत को किसी और रास्ते से पूरा करने की तैयारी में थे।

अगले ही दिन, जिग्नेश ने अपने मित्र को आश्वासन दिया: "तुम्हारे घर बेटी आए तो भी चिंता मत करो। वह अब तुम्हारी नहीं, हमारी बेटी है।"

जब मित्र के घर बेटी का जन्म हुआ, तो जिग्नेश आंबलिया ने उसे पहली बार गोद में लिया। उनके जीवन का वर्षों पुराना खालीपन उस पल जैसे ओझल हो गया। सभी सरकारी प्रक्रियाएँ पूरी करने के बाद, जब बच्ची चार महीने और चार दिन की हुई, तो रक्षाबंधन के पवित्र दिन उसे पहली बार अपने घर लाया गया।

22 सितंबर 2025 को, बेटी के आगमन की खुशी में उन्होंने घर पर एक विशाल हवन का आयोजन किया, जिसमें 250 से अधिक रिश्तेदारों और स्वजनों ने भाग लिया और नन्हीं परी को आशीर्वाद दिया।

आज उनकी बेटी 8 महीने की है, और जिग्नेश जी कहते हैं कि उसके आने से घर की रौनक, दरवाज़े का श्रृंगार और हर सुबह की हँसी सब कुछ बदल गया है। उनके लिए, वह बेटी उनके परिवार के लिए ईश्वर द्वारा भेजे गए आशीर्वाद की तरह है। वह उनकी बेटी नहीं, उनके भाग्य का हीरा है।