कौन हैं शेख हसीना, दुनिया की सबसे लंबे समय तक पीएम रहने वालीं महिला के बारे में जानें सबकुछ
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद, जिनका जन्म 28 सितंबर 1947 को तुंगीपारा (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में हुआ, दशकों तक देश की सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाती रही हैं। अवामी लीग की प्रमुख नेता और बांग्लादेशी कम्युनिस्ट पार्टी (BCP) से भी जुड़ी हसीना ने 1996–2001 तक पहला कार्यकाल और 2009 से 2024 तक लगातार चार कार्यकाल प्रधानमंत्री के रूप में पूरे किए। जनवरी 2024 के विवादित चुनावों के बाद उनका पाँचवाँ कार्यकाल शुरू तो हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में तेज़ विरोध प्रदर्शनों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और देश छोड़ने की नौबत आ गई।
देश में राजनीतिक संकट की शुरुआत छात्रों के उस व्यापक आंदोलन से हुई, जिसमें सिविल सेवा नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया में बड़े बदलाव और पूर्ण रूप से मेरिट-आधारित प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी। सरकार द्वारा कई मांगें मानने के बावजूद आंदोलन एक बड़े सरकारी विरोध में बदल गया, जिसने अगस्त की शुरुआत में हसीना के इस्तीफे की मांग को तेज कर दिया। 5 अगस्त को सेना प्रमुख ने हसीना के इस्तीफे की पुष्टि की और अंतरिम सरकार गठन की घोषणा की। इसके बाद हसीना भारत चली गईं, जहां वे फिलहाल अस्थायी रूप से रह रही हैं। ढाका से आई रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास में घुसकर तोड़फोड़ और लूटपाट की।
शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिनके नेतृत्व में 1971 में देश पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र हुआ। 1968 में उन्होंने वैज्ञानिक एम.ए. वाजेद मिया से विवाह किया। ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे राजनीति में सक्रिय रहीं और 1971 के मुक्ति संग्राम के समय जिस तरह उनके पिता जेल में थे, उस दौरान वे उनके राजनीतिक संपर्क के रूप में काम करती थीं। युद्ध के दौरान उन्हें और उनके परिवार के कई सदस्यों को भी हिरासत में लिया गया था। लेकिन 1975 की वह रात उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई, जब सेना अधिकारियों ने उनके पिता, माता और तीन भाइयों की निर्मम हत्या कर दी। उस समय हसीना देश से बाहर थीं और इसके बाद उन्होंने छह वर्ष निर्वासन में बिताए। इसी दौरान उन्हें अवामी लीग का नेतृत्व सौंपा गया।
1981 में स्वदेश लौटने के बाद हसीना लोकतंत्र और मानवाधिकारों की प्रमुख आवाज़ बनकर उभरीं। इस कारण उन्हें कई बार नज़रबंद भी किया गया। 1990 में उनके नेतृत्व में हुए व्यापक जनआंदोलन के दबाव में सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन 1991 के आम चुनावों में हसीना बहुमत हासिल नहीं कर सकीं और सत्ता प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया (BNP) के हाथ में चली गई। चुनाव में धांधली के आरोपों के चलते अवामी लीग और अन्य दलों ने संसद का बहिष्कार किया, जिससे देश में हिंसक प्रदर्शन और अस्थिरता बढ़ गई। अंततः खालिदा को पद छोड़कर एक कार्यवाहक सरकार को चुनाव की कमान सौंपनी पड़ी, और इसी के बाद हसीना 1996 में प्रधानमंत्री बनीं।
पहला कार्यकाल आर्थिक विकास के लिहाज से सफल रहा, लेकिन राजनीतिक तनाव लगातार बना रहा। विपक्षी BNP की हड़तालों और संसद बहिष्कार के कारण शासन पर असर पड़ा। 2001 के चुनाव में हसीना को हार का सामना करना पड़ा और एक बार फिर चुनाव में धांधली का आरोप लगाया गया। इसके बाद के वर्षों में भी हसीना विपक्ष की एक मजबूत नेता बनी रहीं। 2004 में उन्हें एक रैली में ग्रेनेड हमले का सामना करना पड़ा। 2007 में सेना समर्थित अंतरिम सरकार ने आपातकाल लगाकर उन्हें जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया। खालिदा जिया भी इसी दौरान भ्रष्टाचार के मामले में जेल भेजी गईं। दोनों बाद में रिहा हुईं और 2008 के चुनावों में हसीना भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटीं।
इसके बाद 2009 से 2024 तक हसीना ने लगातार चार कार्यकाल पूरे किए, लेकिन आरोप, विवाद और विपक्ष पर दमन जैसे मामलों ने उनकी सरकार को लगातार निशाने पर रखा। अंततः 2024 के व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने उनकी राजनीतिक यात्रा को अचानक समाप्त कर दिया।