Bihar Election : आखिर कैसे फेल हो गई तेजस्वी यादव की स्ट्रैटजी? 5 पॉइंट में समझें कहां हो गई चूक
बिहार में दो चरणों के तहत विधानसभा चुनाव संपन्न हो गया। इसके साथ ही आज 14 नवंबर को सुबह 8 बजे से ही मतों की गणना जारी है। सुबह से ही एनडीए लगातार बढ़त बनाए हुए है। वहीं महागठबंधन को इस बार चुनाव में मुंह की खानी पड़ी है। चुनाव के पहले से ही विपक्ष के सबसे बड़े नेता और सीएम पद के दावेदार तेजस्वी यादव लगातार बड़े वादे कर रहे थे। तेजस्वी यादव के नौकरी से लेकर महिलाओं के खाते में रुपये भेजने के तमाम दावे धरे के धरे रह गए। ऐसे में तेजस्वी यादव की स्ट्रैटजी कहां फेल हो गई, इसे लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।
1. 52 यादव उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला महंगा साबित हुआ।
राजद की हार का मुख्य कारण 52 यादव उम्मीदवारों (कुल उम्मीदवारों का 36%) को टिकट देना साबित हुआ है। 2020 में यह संख्या 40 से बढ़ाकर राजद की जातिवादी छवि को मज़बूत किया और गैर-यादव (उच्च जाति और अति पिछड़ा) वोट बैंक को हटा दिया, जिससे 'यादव राज' की बू आ रही थी। भाजपा ने चुनाव प्रचार में 'राजद के यादव राज' का नैरेटिव सफलतापूर्वक चलाया। अगर तेजस्वी यादव यादवों के टिकट 30-35 तक सीमित रखते, तो वे अन्य पिछड़ी जातियों के वोटों का हिस्सा बढ़ा सकते थे, जो अखिलेश यादव को 2024 में मिला।
2. सहयोगी दलों को 'कीमत' न देने की गलती
तेजस्वी यादव की रणनीति की सबसे बड़ी चूक सहयोगियों (कांग्रेस, वामदल) को 'समान सम्मान' न देना साबित हुई। उनके 'राजद-केंद्रित' रवैये और सीट बंटवारे के विवादों ने गठबंधन को कमज़ोर कर दिया। इससे वोट ट्रांसफर नहीं हो पाए और एनडीए को एकजुट दिखने का मौका मिल गया।
- कांग्रेस ने 'गारंटी' वाले घोषणापत्र पर ज़ोर दिया, लेकिन तेजस्वी ने 'रोज़गार देंगे' को प्राथमिकता दी, जिससे उनके सहयोगी उनसे दूर हो गए। - तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के घोषणापत्र को 'तेजस्वी प्रण' नाम देकर अपने सहयोगियों को भी पीछे छोड़ दिया। - उन्होंने प्रचार अभियान में भी अपने सहयोगियों को पीछे छोड़ दिया। रैलियों में राहुल गांधी के पोस्टर कम और तेजस्वी के ज़्यादा दिखे। |
3. भविष्य का 'ब्लूप्रिंट' प्रदान करने में विफलता
तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी गलती यही रही कि वे बड़े वादों (जैसे सरकारी नौकरी, पेंशन) का ठोस खाका नहीं दे पाए। धन और क्रियान्वयन योजना की कमी ने मतदाताओं में अविश्वास पैदा किया। हर घर सरकारी नौकरी के मुद्दे पर वे रोज़ कहते रहे, 'अगले 2 दिनों में खाका आ जाएगा', लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद भी वे इसे पेश नहीं कर पाए।
4. 'मुस्लिम-हितैषी' छवि ने नुकसान पहुंचाया
महागठबंधन की 'मुस्लिम समर्थक' छवि तेजस्वी यादव की हार का एक बड़ा कारण बनी। इससे न सिर्फ़ यादव जाति के वोट कम हुए, बल्कि पूरे राज्य के वोट भी कम हुए। इसके अलावा, तेजस्वी का यह बयान कि अगर वे सत्ता में आए तो वक्फ बिल लागू नहीं करेंगे, यादव बंधुओं को रास नहीं आया। भाजपा ने वक्फ बिल के विरोध में लालू यादव के भाषण को वायरल करके इस मुद्दे का फ़ायदा उठाया।
5. लालू प्रसाद की विरासत पर तेजस्वी का असमंजस
तेजस्वी यादव अपने पिता लालू प्रसाद की विरासत को लेकर असमंजस में रहे। एक तरफ़ तो उन्होंने लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय के एजेंडे को अपनाया, लेकिन दूसरी तरफ़ 'जंगलराज' की छवि के डर से दूरी बनाए रखी। पोस्टरों में लालू प्रसाद की छवि को छोटा दिखाने की यह दोधारी नीति उल्टी पड़ गई। प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह मुद्दा उठाया कि तेजस्वी यादव 'लालू प्रसाद के पापों को छुपा रहे हैं' और पोस्टर में लालू को घेरना उनका अपमान है।